परिचय..
मैं श्रीहरि वाणी कानपुर
कभी जो ठीक लगा बगैर लाग लपेट कह देता हूँ, किसी की भावना मान्यता को बदलने या चोट करने को नहीं, बस अपने मन की बात कहने हेतु.. ताकि मन हल्का हो जाये... कोई मार्गदर्शन..सुझाव दें तो अच्छा लगता हैं
चाटुकारिता कर नहीं पाता, हाँ हुजूरी का जमाना हैं, सच कोई सुनना नहीं चाहता और मन को दबा कर झूठ मैं बोल नहीं पाता... स्वत्व को खो कर जीना भी कोई जीना हैं क्या ...???